कइसे जियब ए जान...

तोरा  बिना  हम  कइसे  जियब ए जान. अन्दरे   हमर   दिल   खखोरैत  हे परान.               दिलवा   हमर  तो   हे  केतना  नादान,                तनिको   ना    रह   हे   एकरा  धेयान. चोरी - चोरी  रोज  हम  करहिओ बात, तैयो  ना   जिउआ  हमर  जुड़ा हे जान.                   मोबलिया से  हमर  मनमा ना भर हौ,                    मिलेला  मनमा अबतो खूब छछन हौ.  दुखवा के तू कब  आके करब निदान, मिलेला   तोरा  से  छछनैत   हौ प्रान.                                       -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

बरसात -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

                   बरसात          

रात प्रात हो गई ! वाह! क्या बात हो गई !!
जीवन से आज मौत की अब मात हो गई ॥

भ्रमर गूंज रहे कुसुमों के उन्नत वृन्त पर,
मुग्ध तितलियाँ भी तो उनके साथ हो गईं॥

कलरव करते उतर आये पक्षियों के वृन्द,
पुनः मिलने की तब उनसे बात हो गई ॥

अनमने मदिर ऊँघते गगन में ये बादल,
पर्वतों से फिर उनकी मुलाकात हो गई ॥

आज अचानक मौसम ने ली है अँगड़ाई,
जंगल की आग अब  यहाँ शांत हो गई ॥

आज वन-उपवन का मन बाग-बाग हो गया,
प्यासी धरा पर  झमाझम  बरसात हो गई ॥

                                -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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