कइसे जियब ए जान...

तोरा  बिना  हम  कइसे  जियब ए जान. अन्दरे   हमर   दिल   खखोरैत  हे परान.               दिलवा   हमर  तो   हे  केतना  नादान,                तनिको   ना    रह   हे   एकरा  धेयान. चोरी - चोरी  रोज  हम  करहिओ बात, तैयो  ना   जिउआ  हमर  जुड़ा हे जान.                   मोबलिया से  हमर  मनमा ना भर हौ,                    मिलेला  मनमा अबतो खूब छछन हौ.  दुखवा के तू कब  आके करब निदान, मिलेला   तोरा  से  छछनैत   हौ प्रान.                                       -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

भक्त हरिनाथ विरचित सरस्वती माता की आरती

मगही के आदिकवि भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त संत शिरोमणि हरिनाथ पाठक द्वारा रचित श्रीसरस्वती देवी की आरती

   ।। राग गौरी ।। ताल ३।। पद ठुमरी ।।

आरति साजि सरस्वतिजीको, 
                  सकल मनोरथ लीजेहीको।।

ब्रह्म विचार सार परमासित, 
       आदि जगत व्यापिनि शक्ति को।।१।।

वीणा पुस्तकधर भयटारिणि, 
          जड़तानाशिनि मातु सती को।।२।।

हस्तेस्फाटि कस्त्रज कमलासनि, 
   दायिनि निज जन विमल मती को।।३।।

जन हरिनाथ विषय सब तजि भज, 
      मति अंधिआरि हरणि जननी को।।४।।२०।।

                                 -*श्रीललितभागवत* से

प्रस्तुति -धर्मेन्द कुमार पाठक

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