कइसे जियब ए जान...

तोरा  बिना  हम  कइसे  जियब ए जान. अन्दरे   हमर   दिल   खखोरैत  हे परान.               दिलवा   हमर  तो   हे  केतना  नादान,                तनिको   ना    रह   हे   एकरा  धेयान. चोरी - चोरी  रोज  हम  करहिओ बात, तैयो  ना   जिउआ  हमर  जुड़ा हे जान.                   मोबलिया से  हमर  मनमा ना भर हौ,                    मिलेला  मनमा अबतो खूब छछन हौ.  दुखवा के तू कब  आके करब निदान, मिलेला   तोरा  से  छछनैत   हौ प्रान.                                       -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

तेरा ही तो मैं हूँ. -धर्मेन्द्र कुमार पाठक



तेरा   ही   तो   मैं   हूँ,   कहो   मैं   कहाँ  हूँ.
यहाँ    हूँ,   वहाँ   हूँ,  बताओ   मैं  कहाँ   हूँ. 

तेरे   बिन   एक   पल   भी   बीता  नहीं  है;
तेरा    हृदय  प्रेम  से  कभी  रीता  नहीं   है;
तुम  यदि  ना चाहो  तो कोई जीता नहीं है;
अब  हर  हाल  में  मैं  खुश  रहता  जहाँ  हूं.
तेरा  ही  तो  मैं  हूँ ....

जो   कुछ  भी  दिया  तूने  शिकवा  नहीं  है;
कल  क्या  होगा   मुझको  परवाह  नहीं  है;
सौंप   दिया   हूँ    सारा   जीवन   तुम्हें  मैं;
इसलिए  सदा   मस्त  रहता  मैं   जहाँ   हूँ. 
तेरा ही तो मैं हूँ ...

खुशी-गम क्या है मैं कभी समझता नहीं हूँ; 
हानि - लाभ  क्या  है  मैं समझता  नहीं हूँ; 
मान - अपमान  से  कभी  डिगता  नहीं हूँ; 
हर   सफर   में  हरदम  मैं  तन्हा  रहा   हूँ. 
तेरा  ही तो मैं हूँ ....

तू   मेरे   साथ  है  तो  दुख  क्यों   मनाऊँ; 
तुझे  छोड़कर  मैं  और  किसको  रिझाऊँ; 
तुमसे  इतर  और इस दुनिया में  क्या है;
तुमको  ही तो  सब कुछ  समझता रहा हूँ. 
तेरा ही तो मैं हूँ ....

लेना  या  देना  क्या  प्यार  में   बताओ;
खोना या पाना क्या मुझको  समझाओ;  
हे   मुरलीवाले!   मुझे  रास्ता  दिखाओ;
वहीं आ जाओ न जिस हाल में  जहाँ  हूँ.  
तेरा ही तो मैं हूँ ....

                        -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.  



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